आज जानते हैं कि भारत में एक ऐसी जनजाति है, जिसे आज सही से पूरी दुनिया नहीं जान पाई ?

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सेंटिनेली जनजाति, भारत के आंधमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित सेंटिनेल द्वीप पर निवास करने वाली एक आदिवासी समुदाय है। यह समुदाय एक जनसंख्या और संगठनिक रूप से अलग है और उनका संपर्क बाहरी दुनिया से काफी प्रतिबंधित है।

सेंटिनेली जनजाति को “आदिवासी” या “आदिवासी वनवासी” के रूप में वर्णित किया जाता है, जो उनके जीवनशैली और सामाजिक संगठन की प्राथमिक विशेषताओं को दर्शाता है। उनका प्रमुख आवास स्थान, सेंटिनेल द्वीप है, जो भारत के आंधमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित है।

सेंटिनेली जनजाति की जनसंख्या तथा उनके संगठनिक और आर्थिक स्तर के बारे में बहुत कम जानकारी है, क्योंकि यह एक अत्यंत अलगाववादी और अनुपस्थिति प्रिय समुदाय है। उन्होंने अपनी अलगाववादी और प्रकृति से दूर रहने की प्राथमिकता रखी है और उनका संपर्क बाहरी दुनिया से काफी रोका गया है। इसके बावजूद, विज्ञानियों ने अब तक कुछ जानकारी प्राप्त की है और समुदाय के बारे में कुछ मान्यताएं और तथ्यों का पता लगाया है।

सेंटिनेली जनजाति का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन बहुत सरल है। वे अपने जीवनशैली के माध्यम से खाना मांगने और संग्रह करने के लिए बनाए गए आदिवासी औजारों का प्रयोग करते हैं। उनका संगठन छोटा है और परिवार मूल्यों, धार्मिक मान्यताओं और समुदाय के नियमों पर आधारित है।
उनकी भाषा, संगीत, नृत्य, कला और साहित्य का विकास भी हुआ है, जिसमें उनके सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतिबिंब दिखता है।

यह महत्वपूर्ण उल्लेखनीय है कि सेंटिनेली द्वीप पर प्रवेश अवैध है और उसे संरक्षण क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है। संयुक्त राष्ट्र और भारतीय सरकार ने इसे संरक्षण के लिए दर्ज किया है ताकि सेंटिनेली जनजाति की स्थिति बनी रहे और उनकी संरक्षा की जा सके।

सेंटिनेली जनजाति के लोगों की उत्पत्ति और उनका आवास स्थान के बारे में बहुत कम जानकारी है। वे प्राचीन काल से इस द्वीप पर रह रहे हैं और उनके जीवनशैली, भाषा, और संगठन का अध्ययन करने में मुश्किल है। इसलिए, उनके बारे में बहुत कुछ नहीं ज्ञात है और वे एक अनपठ जनजाति के रूप में चिंतनीय हैं।

सेंटिनेली नाम कैसे पड़ा, इसके बारे में भी कुछ नहीं ज्ञात है। विदेशी यात्रियों और शोधकर्ताओं ने इन लोगों को उनके निवास स्थान के नाम पर ही संदर्भित किया है। “सेंटिनेली” नाम आंडमान द्वीप समूह के अन्य द्वीपों के नामों के साथ संगठित तरीके से प्रयोग किया जाता है। यह नाम आमतौर पर उनके निवास स्थान “सेंटिनेल द्वीप” के साथ जोड़कर प्रयोग किया जाता है।

हाल ही में एक ईसाई मिशनरी इन लोगों को बाइबल का पाठ पढ़ाने गया था और कोशिश कर रहा था कि इन्हें ईसाई धर्म से जोड़ा जाए. हालांकि, इन सेंटिनली लोगों ने उसे तीर मारकर उसकी हत्या कर दी. इन लोगों ने इससे पहले भी कई बार बाहरी लोगों पर हमले किए हैं. इनके पास धारदार तीर और भाले होते हैं.

भारत सरकार के इनके बारे में दिशा निर्देश-

इन सेंटिनली लोगों की जनजाति को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की ग्रेट अंडमानी, ओंग, जारवा और शोम्पेन PVTG के रूप में सूचीबद्ध अन्य चार जनजातियों में से एक के बराबर दर्जा दिया गया है. दरअसल, इन सभी जनजातियों को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956 द्वारा संरक्षण दिया गया है. यह कानून जनजातियों के कब्ज़े वाले पारंपरिक क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करता है और अधिकारियों के अलावा किसी के भी यहां प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है. इसके साथ ही इन जनजाति लोगों की फोटो लेना या उन पर किसी भी प्रकार के फिल्मांकन का कार्य करना एक अपराध है.

1967 में त्रिलोकनाथ पंडित इस आइलैंड तक पहुंचे. वो एक सरकारी दस्ते के साथ पहुंचे थे. उनकी नाव आइलैंड तक पहुंची. दूरबीन से देखा तो सेन्टिनली आदिवासी दिखाई दिए लेकिन बोट देखते ही वो जंगल की ओर भाग गए. TN पंडित और उनकी पार्टी ने क़दमों के निशान का पीछा किया. अंदर जंगल में उन्हें 18 झोपड़ियां दिखाई दी. पहली बार इन लोगों के बारे में कुछ पता चल रहा था. झोपड़ियां घास और लकड़ियों की बनाई थी. अंदर आग जल रही थी. वहां शहद, सुंअर की हड्डियां थी. लकड़ी के कुछ बर्तन थे, कुछ भाले और तीर भी मिले. तीर की नोक पर लोहा लगा था, जिससे पता चला कि ये लोग मेटल से वाकिफ थे. इन लोगों की किसी आदिवासी से मुलाक़ात तो नहीं हो पाई लेकिन वहां कुछ मेटल के बर्तन और नारियल जरूर छोड़ आए.

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ये आम लोग नहीं थे. छोटे कद के लेकिन तगड़े आदमी जिनके घुंघरालु बाल थे. इनमें से किसी ने भी कपड़े नहीं पहन रखे थे. सिवाए एक बेल्ट जैसी चीज के जो उनके कमर से बंधी थी. साथ ही इन लोगों ने भाले और धनुष- तीर पकड़ रखे थे. जिन्हें वो हवा में लहरा रहे थे.

आदिवासियों से पहला कांटेक्ट
सेन्टिनली लोगों से एकमात्र कांटेक्ट साल 1991 में हुआ. तब अन्थ्रोलोपोजिस्ट की एक टीम द्वीप पर पहुंची थी.मधुमाला चट्टोपाध्याय शामिल थीं. मधुमालाके रूप में पहली बार सेन्टिनली लोगों का सामना एक महिला से हो रहा था. इसका असर भी दिखा. तोहफे लेने के बाद एक आदिवासी पुरुष ने मधुमाला की ओर धनुष तान दिया. उसी समय एक आदिवासी महिला ने पुरुष को धक्का देकर तीर चलाने से रोक दिया. इस दौरान पहले टीम की तरफ से पानी में बहाकर नारियल दिए गए. फिर बाद में सेन्टिनली लोग कुछ नारियल हाथों से लेने के लिए भी तैयार हो गए.

Madhumala C

अब एक नजर डालते हैं कि इन लोगों के बारे में हमें अब तक पता क्या है?

  • पहली बात ये कि ये लोग आदमखोर नहीं है. चूंकि आदिवासी मरे हुए साथियों की हड्डियां गले में पहनते हैं, इस कुछ लोग ऐसा समझते हैं, लेकिन इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं.
  • ये लोग झोपड़ी बनाकर रहते हैं. और जमीन पर सोते हैं.
  • इनमें आदमियों और औरतों की ऊंचाई लगभग 5 फुट के आसपास होती है
  • ये लोग आग जलाना नहीं जानते, बल्कि बिजली गिरने पर चिंगारी को संभाल कर रखते हैं और उसी से काम चलाते हैं
  • ये लोग खेती नहीं करते बल्कि आदिमानव की तरह शिकार और खाना इकठ्ठा करते हैं
  • इसकी भाषा अंडमान की बाकी भाषाओँ से बिलकुल अलग है.
  • इस इलाके में 50 से 200 के बीच लोग रहते हैं.
  • ये नाव चलाना जानते हैं लेकिन तैर नहीं सकते.

सरकार की तरफ से यहां जाने पर पाबंदी है. और ये लोग भी नहीं चाहते कि इनसे कांटेक्ट किया जाए. इसके वाजिब कारण भी हैं. साल 1858 में अंग्रेज़ों ने अंडमान को अपनी कॉलोनी का हिस्सा बनाया था. तब यहां अलग-अलग प्रजाति के 7 हजार आदिवासी रहते थे. ब्रिटिशर्स के आने के साथ आई बीमारियां. इन लोगों में इन बीमारियों के लिए कोई नेचुरल इम्युनिटी नहीं थी. इसलिए 150 साल बाद इनकी संख्या सिर्फ 300 के आसपास रह गयी हैं. अधिकतर जनजातियां लुप्त हो चुकी हैं. सेन्टिनली जनजाति एक मात्र जनजाति है जिसे बाहरी लोगों से दूरी बनाकर राखी है. और इसी कारण ये बचे भी हुए हैं. यहां जाकर आप नहीं कह सकते कि विकास और तरक्की इंसान के लिए जरूरी हैं. यहां सिर्फ जीना ही काफी है.

पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद

– पूजा पांडेय

Published by Eraofgirl

I am a Certified Naturopath & Panchkarma Doctor and Consultant. Consultation is free!

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