
आइए सच्चायी से रूबरू करवाती हूँ आपको –

17th century में आये अंगरेज़ों ने आम भारतीयों को एक-एक रोटी तक को मोहताज कर दिया। फिर उन्होंने गुलामी (दासता की प्रथा) की शर्त पर लोगों को विदेश भेजना प्रारंभ किया। इन मज़दूरों को गिरमिटिया कहा गया। गिरमिट शब्द अंगरेजी के `एग्रीमेंट’ शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है। जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगवाकर हर साल हज़ारों मज़दूर दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे, उसे मज़दूर और मालिक `गिरमिट’ कहते थे। इस दस्तावेज के आधार पर मज़दूर गिरमिटिया (slave) कहलाते थे। हर साल 10 से 15 हज़ार मज़दूर गिरमिटिया बनाकर Fiji , Guyana , Dutch Suriname ,South Africa , South America , Netherlands , Tobago, Trinidad ,Malesiya, Mauritius आदि को ले जाये जाते थे। यह सब सरकारी नियम के अंतर्गत था। इस तरह का कारोबार करनेवालों को सरकारी संरक्षण प्राप्त था।

गुलाम पैसा चुकाने पर भी गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता था, लेकिन गिरमिटियों के साथ केवल इतनी बाध्यता थी कि वे पांच साल बाद छूट सकते थे। गिरमिटिये छूट तो सकते थे, लेकिन उनके पास वापस भारत लौटने को पैसे नहीं होते थे। उनके पास उसके अलावा और कोई चारा नहीं होता था कि या तो अपने ही मालिक के पास काम करें या किसी अन्य मालिक के गिरमिटिये हो जायें। वे भी बेचे जाते थे। काम न करने, कामचोरी करने पर प्रताड़ित किये जा सकते थे। आमतौर पर गिरमिटिया चाहे औरत हो या मर्द उसे विवाह करने की छूट नहीं थी। यदि कुछ गिरमिटिया विवाह करते भी थे तो भी उन पर गुलामी वाले नियम लागू होते थे। जैसे औरत किसी को बेची जा सकती थी और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे। गिरमिटियों (पुरुषों) के साथ चालीस फीसदी औरतें जाती थीं, युवा औरतों को मालिक लोग रखैल बनाकर रखते थे और उनका भरपूर यौनशोषण करते थे। आकर्षण खत्म होने पर यह औरतें मज़दूरों को सौंप दी जाती थीं। गिरमिटियों की संतानें मालिकों की संपत्ति होती थीं। मालिक चाहे तो बच्चों से बड़ा होने पर अपने यहां काम करायें या दूसरों को बेच दें। गिरमिटियों को केवल जीवित रहने लायक भोजन, वस्त्रादि दिये जाते थे। इन्हें शिक्षा, मनोरंजन आदि मूलभूत ज़रूरतों से वंचित रखा जाता था। यह 12 से 18 घंटे तक प्रतिदिन कमरतोड़ मेहनत करते थे। अमानवीय परिस्थितियों में काम करते-करते सैकड़ों मज़दूर हर साल अकाल मौत मरते थे। मालिकों के जुल्म की कहीं सुनवाई नहीं थी

विशेष तौर पर जिन्हें भारत से सन् 1834 से 1917 के बीच ले जाया गया। आज उनकी नई पीढ़ियाँ अपने-अपने देशों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मामलों पर गहरा प्रभाव बना चुकी हैं। उनके में में भारत के प्रति एक आकर्षण है। इनके पूर्वज अपने साथ अपनी संस्कृति और भाषा को भी लेते गए थे। आज सदियां व्यतीत हो जाने पर भी उन्होंने अपनी भाषा को जीवित रखा है, भले ही उसमें अनेक प्रकार के परिवर्तन आते रहे हैं।
इन मजदूरों के साथ एग्रीमेंट करके उन्हें पांच वर्ष के लिये किसी निश्चित वेतन पर लिया जाता था। जो घर से चलने के पूर्व उन्हें प्राय: बताया नहीं जाता था। उन्हें कहा जाता था कि जहां वे जा रहे हैं, वहां की धरती सोने से भरी हुई है। इसलिए लौटने पर वे बहुत ही धनवान होकर लौटेंगे। बिचौलियों द्वारा उन्हें उज्ज्वल भविष्य के सुनहरे सपने दिखाए जाते थे। कहा जाता था कि वहां पर तुम्हें मुफ्त भूमि, खाना-पीना और वेतन के अतिरिक्त सभी सुविधाएं मिलेंगी तथा बहुत-सा धन कमाकर पांच साल बाद अपने देश लौट सकेंगे। उन्हें अपनी मंजिल की दूरी, वहां के रहन-सहन, वेतन इत्यादि के संबंध में कुछ भी पता नहीं होता था। वास्तव में ऐसे लोगों का लौटना कभी-कभार ही होता था, क्योंकि उन्हें वहां बहुत ही दयनीय स्थिति में रहना पड़ता था। उन्हें वहां कुली के रूप में काम करके धन कमाना होता था, जो उनके जीवन-निर्वाह के लिये भी कम पड़ता था। समझौते की अवधि के बाद उन्हें अपने देश लौटने का अधिकार था, परंतु आर्थिक संकटों के कारण बहुत ही कम लोग इस विकल्प को चुनते थे।
भारत में उन दिनों ब्रिटिश शासन के शोषण के कारण सर्वत्र गरीबी का बोलबाला था। देश के विभिन्न भागों को अक्सर सूखे और अकाल का सामना करना पड़ता था। अशिक्षा के कारण बहुत कम लोग समझौते की शर्तों को ठीक से समझ पाते थे। वे बिचौलियों की शर्तों को ठीक से समझ पाते थे। वे बिचौलियों अथवा अंग्रेज अधिकारियों के कहने पर ऐसे कागजों पर अपना अँगूठा लगा देते थे। अधिकांश लोगों को भ्रमित करके ही करके ही ले जाया जाता था। समुद्री यात्रा का मार्ग बहुत ही कठिन था और बहुत से लोगों की तो मार्ग में ही मृत्यु हो जाती थी। यात्रा 10 से 20 सप्ताह के बीच पूरी होती थी। यह निर्भर करता था कि उन्हें कितनी दूर ले जाया जा रहा है और जिस जहाज में यात्रा करनी है, उसकी स्थिति कैसी है। कैरेबियन द्वीप समूह में जाने वालों में से 17-20 प्रतिशत श्रमिक विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होकर रास्ते में ही मर जाते थे।


मुख्य रूप से विभिन्न उपनिवेशों में ऐसे मजदूरों को गन्ने की खेती करने के लिये ले जाया गया था। सन् 1834 में मॉरीशस के लिए जिन बंधुआ मजदूरों को बिहार से भेजा गया था, उन्हें गन्ने की खेती ही करनी होती थी, ताकि वहां चीनी उद्योग पनप सके। सर्वविदित है कि भारतीय बहुत परिश्रमी होते हैं और किसी भी स्थानीय वातावरण में अपने आप को आसानी से ढाल लेते हैं। इसलिए वहां पर भारत के विभिन्न भागों से भी श्रमिक भेजे जाने लगे और लगभग सौ साल की अवधि में वहां पर भारतवंशियों की संख्या 5 लाख के करीब हो गई। अब वहां पर बंगाल, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे प्रदेशों से पहुंचने वाले मजदूरों की संख्या में वृद्धि होने लगी। बिहार, उत्तरप्रदेश और अवध के मजदूरों से घुलने-मिलने के लिये भोजपुरी के माध्यम से हिंदी का प्रयोग संपर्क भाषा के रूप में होने लगा। अधिकांश देशों में भारतीय कुली बनकर गये थे, परंतु आज उनके वंशज वहां के प्रशासन के कर्ताधर्ता हैं।
स्मरणीय है कि छेदी जगन गुआना के प्रथम राष्ट्रपति बने। विश्व की राजनीति में उनका योगदान भी उल्लेखनीय है। सूरीनाम एक कृषि प्रधान देश है। क्योंकि यह हालैंड का उपनिवेश था, इसलिए उन्हें भारत से मजदूर ले जाने के लिए इंग्लैंड से आज्ञा लेनी पड़ती थी। सन् 1873 में लालारुख नामक जहाज 410 लोगों को लेकर भारत से चला था। 11 लोगों की रास्ते में ही मृत्यु हो गई थी। सूरीनाम का क्षेत्रफल इंग्लैंड से भी पांच गुना है। अब बहुत से भारतीय मूल के लोग सूरीनाम से आकर हालैंड में बस गए हैं।
फीजी में मजदूरों को लाने वाला जहाज 14 मई, 1834 को पहुंचा था। अब बहुत से लोग ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा के अतिरिक्त अमेरिका में जाकर बस गए हैं।
गुआना में 5 मई, 1838 को मुख्यत: कलकत्ता से लाए गए श्रमिकों को उतारा गया था। इनकी भर्ती मुख्य रूप से बिचौलियों के माध्यम से की गई थी। आज भारतीय मूल के लोग वहां की राजनीति और व्यापार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
त्रिनिदाद और टोबैको टापुओं के बहुत से भारतीय मूल के लोग निकलकर अनेक यूरोपीय देशों एवं अमेरिका में स्थायी रूप से बस गए हैं। कुछ और लोग भी इसकी तैयारी कर रहे हैं।
मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम, गुआना, त्रिनिदाद और टुबैको में भारतीय मूल के लोगों ने जो संघर्ष किया और बाद में वहां पर अपनी प्रतिभाओं के झंडे गाड़े, यह सब को ज्ञात है। उन्होंने छोटे-छोटे स्थानों पर अकेले दम पर अपनी आस्थाओं की ज्योति प्रज्ज्वलित की।
प्रथम प्रवासी भारतीय श्रमिक के फीजी में अपना पग रखते ही हिंदी का प्रवेश यहाँ हो गया था। क्योंकि अधिकांश श्रमिक भारतवर्ष के हिंदी भाषी प्रदेशों से यहाँ आए थे अतः यहाँ उन्हीं की ही भाषा स्थापित हुई और इस तरह हिंदी भारतीयों की प्रमुख भाषा बनी। आज प्राथमिक पाठशालाओं से लेकर विश्वविद्यालय तक पढ़ाई जाने वाली हिंदी फीजी की एक महत्वपूर्ण भाषा है तथा समाचार माध्यमों में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान देखा जा सकता है। फीजी में प्रथम प्रवासी भारतीयों का आगमन सन् 1879 ई के 15 मई को हुआ। तब से लगातार लगभग चालीस वर्षों तक वे मज़दूरों के रूप में यहाँ आते रहे। सन् 1916 ई. तक 60,000 से भी अधिक प्रवासी भारतीय फीजी पहुँचते रहे और श्रमिकों के रूप में इस छोटे से द्वीप को आबाद करते रहे।
भारतवर्ष तब ब्रिटिश सरकार के आधीन था। भारत से दूर सुदूर पूर्व में प्रशांत महासागर के दक्षिण प्रांगण में चार सौ से भी अधिक छोटे-छोटे द्वीपों का समूह फीजी भी ग्रेट ब्रिटेन का एक उपनिवेश था। गन्ना उत्पादन के लिए यह देश अत्यधिक अनुकूल एवं उपयुक्त पाया गया। पड़ोसी देश ऑस्ट्रेलिया की एक चीनी कंपनी फीजी में गन्ने का व्यापार सँभाल रही थी। गन्ना-खेतों पर काम करने के लिए सही श्रमिक मिल नहीं रहे थे।
देश के आदिम निवासी खेत में काम करना नहीं चाहते थे। यह उनकी प्रकृति के विपरीत था। वे मौज-मस्ती और आज जियो कल देखा जाएगा की भावना से ओत-प्रोत थे। फिर भला वे खेत में क्यों काम करते? देश में प्राकृतिक संपदा की कमी नहीं थी। यहाँ के समुद्र और नदियों में विभिन्न प्रकार की मछलियों की बहुतायत रही और छोटे बड़े वनों में जड़-पदार्थ की कमी कभी भी नहीं रही। जीविका के लिए तो उन्हें आवश्यक वस्तुएँ स्वतः ही उपलब्ध थीं। फिर भला मेहनत मशक्कत कर जीविकोपार्जन की आवश्यकता ही कहाँ रही? गन्ना के खेतों में मजदूर बनकर कड़ी मेहनत करना उनके स्वभाव के विपरीत था।
पास-पड़ोस के कुछ अन्य द्वीपों से भी श्रमिक लाए गए। लेकिन उनके द्वारा भी गन्ने की खेती बढ़ाई नहीं जा सकी। कुछ अन्य देशों से भी श्रमिक आयात किए गए, लेकिन उनका भी समय गन्ने के मीठे और स्वादिष्ट रस चूसने में अधिक बीता, खेतों में मरना उन्हें नहीं भाया। अंततः भारतवर्ष से प्रवासी भारतीयों को ही इस कार्य संपादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समझा गया क्योंकि वे मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना जैसे उपनिवेशों में अपनी योग्यता पहले ही प्रकट कर चुके थे। अतः यह स्वाभाविक था कि फीजी में गन्ने की खेती को सफल बनाने के लिए भारत से ही श्रमिक आयात किए जाएँ। शासकों का निर्णय कार्य रूप में परिणत हुआ और यहाँ की गन्ना-कंपनी को इस ओर आशातीत सफलता मिली।
हज़ारों प्रवासी भारतीय श्रमिक फीजी लाए गए और पाँच वर्षों का शर्तबंदी जीवन व्यतीत कर उनमें से अधिकांश गिरमिटिया यहीं बस गए। इससे गन्ने की खेती को और भी अधिक बढ़ावा मिला। “शर्तबंद अथवा अग्रीमेंट के अंतर्गत आने के कारण वे शर्तबंदी मज़दूर कहलाए और अंग्रेज़ी का तत्सम शब्द अग्रीमेंट बिगड़ कर गिरमिट हो गया। गिरमिट काटने वाले गिरमिटिया कहलाए।
गिरमिट काल में साहित्य रचना नगण्य ही रही है। चालीस वर्षों के इस अंतराल में रामायण, महाभारत, आल्हखंड जैसे महाकाव्यों से संबंधित कथाएँ कहा-सुनी जाती रहीं, साथ ही अन्य प्रेरक एवं मनोरंजक किस्सा-कहानी भी समय काटने का माध्यम रहीं। पूरे गिरमिट काल में अव्यवस्थित ढंग से हिंदी साँस लेती रही, हिंदी जीवित रही। इन दिनों पारंपरिक एवं तत्कालीन परिस्थितियों पर आधारित लोकगीतों का ही बोल-बाला था जो विशेषतः लोक रीतियों को पुष्ट करता रहा, उनका संरक्षण और संवर्धन करता रहा।
सन् 1916 में गिरमिट प्रथा का अंत हो गया लेकिन 1920 तक उसका प्रभाव बना ही रहा। दैनिक जीवन में कोई विशेष बदलाव नहीं आया। लेकिन हाँ, 1920 के बाद अनेक परिवर्तन होने लगे – लोगों के जीने की व्यवस्था में सुधार होने लगा, अपनी संतति के भविष्य को सँवारने-सुधारने के उपाय सोचे जाने लगे। जहाँ-तहाँ पाठशालाओं की स्थापना का प्रबंध होने लगा, लोगों के सोचने-विचारने में भी परिवर्तन आने लगा। व्यवस्थित एवं उन्नत जीवन जीने का संघर्ष ज़ोर पकड़ने लगा।
भारतवर्ष से हिंदी की किताबें मँगाई जाने लगीं। किस्सा-कहानी, नाटक-नौटंकी, मेला-ठेला आदि के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा। लोगों में अपने व्यक्तित्व, अपना परिचय आदि बनाए रखने की ओर ध्यान अधिक आकर्षित होने लगा।
पाठशालाओं के साथ लिखित साहित्य की ओर भी ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक था। पाठशालाओं में औपचारिक रूप से पढ़ाए जाने के लिए तथा स्वयं का ज्ञान संवर्धन हेतु किताबें मँगाई जाने लगीं। फलस्वरूप सदाबृज-सारंगा, गुलबकावली, गुलसनोवर, हातिमताई, सिंहासन बत्तीसी, बैताल-पचीसी, बाला-लखंदर जैसी सहज ग्राह्य पुस्तकों का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा।
किस्सा-कहानी के कारण बैठकें जमने लगीं। आल्हखंड, भरथरी, सारंगा आदि की स्वर-लहरियाँ गूँजने लगीं। मंदिरों का निर्माण होने लगा, रामायण पाठ होने लगे, आल्हा की बैठकें जमने लगीं और साथ ही धार्मिक अनुष्ठान भी होने लगे। धर्म प्रचार हेतु ब्राह्मण-पुरोहित आगे बढ़े, पुरुषों और महिलाओं की मंडलियाँ गाँव-गाँव में बनने लगीं और फिर राम-नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, दीवाली आदि त्यौहारों का समय-समय पर आयोजन होने लगा, बैठकें जमने लगीं।
धार्मिक पर्वों और उत्सवों की अभिवृद्धि के साथ-साथ, राष्ट्र के अनेक इलाकों में रामलीला और दशहरा का भी आयोजन होने लगा। रामायण, प्रेम सागर, विश्राम सागर, आल्हखंड जैसे ग्रंथों ने जहाँ हिंदी भाषा को बनाए रखने की प्रेरणा दी वहीं औपचारिक रूप से हिंदी पढ़ने-पढ़ाने के प्रति भी प्रबुद्ध-समुदाय का ध्यान खींचा। प्रायः सभी भारतीय पाठशालाओं में पढ़ाने का माध्यम हिंदी ही बनी और वर्षों पर्यंत चौथी कक्षा तक इन पाठशालाओं में हिंदी ही शिक्षण का माध्यम रही।
हिंदी की स्थापना में बहुत से लोगों ने हाथ दिया। कई पढ़े-लिखे हिंदी-प्रेमी अपनी रचनाएँ भी हिंदी में करने लगे और जैसे-तैसे उनके प्रकाशन की भी व्यवस्था होने लगी। स्वाभाविक ही था इस प्रवाह को सुनियोजित एवं व्यवस्थित करने के लिए तथा स्थानीय लोगों के उत्साहवर्धन के लिए हिंदी-प्रेस और हिंदी समाचार पत्रों को बढ़ावा दिया जाए। जागृति, फीजी समाचार, शांतिदूत, प्रशांत समाचार सामने आए। इन समाचार पत्रों के सहारे फुटकर पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होने लगीं।
फीजी में जब 1879-1920 तक भारतवर्ष से गन्ने के खेतों तथा चीनी मिलों में काम करने के लिए भारतीय श्रमिक लाए जाते रहे तो वे साधारण जन अपने साथ अपनी भाषा, संस्कृति एवं धर्म लाए। फीजी के लिए श्रमिकों को भारत के विभिन्न प्रांतों से लाकर कलकत्ता से पानी के जहाज़ों द्वारा फीजी लाया जाता रहा। कलकत्ता से आख़िरी बार अपनी मातृभूमि से विदा होने के कारण इन बिछुड़े हुए लोगों को कलकतिया और एक ही जहाज़ में सभी को एक साथ सफ़र करने के कारण जहाजी भाई कहा जाने लगा। कलकतिया एवं जहाजी भाई शब्दों ने फीजी में आए प्रवासी भारतीयों को आत्मीयता के बंधन में बाँध कर और भी क़रीब ला दिया। इनमें से अधिकांश लोग हिंदी बोलते थे, कुछ लोग लिखते-पढ़ते भी रहे इसलिए हिंदी ही प्रवासी भारतीयों की संपर्क भाषा बनी। फीजी में हिंदी के इस उद्भव काल को गिरमिट काल कहना ज़्यादा समीचीन होगा। यह काल हमारे पूज्य पूर्वजों के लिए उत्पीड़न, शोषण एवं निराशा का काल था। इन्हें इंसान कम, पशु अथवा गुलामों से भी गिरे हुए रूप में औपनिवेशिक मालिकों ने देखा। उनका व्यवहार भी अधिकांशतः अमानुषिक, क्रूर, अत्याचार तथा अन्यायपूर्ण था। तब हिंदी पढ़ना-पढ़ाना बिल्कुल कानून विरोधी माना जाता था। फिर भी अपने को राम जी जैसे वनवासी मानते हुए धर्म की भावना से ओतप्रोत भारतीयों ने अपनी भाषा की ज्योति जलाए रखने का दृढ़ संकल्प लिया। इस बीच दीनबंधु-सी एफ एंडÜस जैसे अच्छे अंग्रेज़ पादरी भी इस देश में आए और प्रवासी भारतीयों के प्रति गहन संवेदना एवं सहिष्णुता का व्यवहार किया। शिक्षा के क्षेत्र में विशेष बल दिया जाने लगा और लोगों ने तुलसी की रामायण को अपने दामन से बाँधे रखा। जिन लोगों को हनुमान चालीसा, रामायण की चौपाई, कबीर के दोहे याद रहे, साथ ही पूजा-पाठ के कुछ मंत्र, संस्कृत के कुछ श्लोक, ग्राम्य जीवन की कुछ कहावतें, मुहावरे और लोकोक्तियाँ याद रहीं, कबीर, सूर, मीरा, रैदास और तुलसी के भजन-कीर्तन याद रहे और महिलाओं को जो लोक-गीत याद थे उन सभी का इस काल में भरपूर प्रयोग किया गया। दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद शाम को अथवा रविवार की छुट्टी के दिन इन्हें जब भी कुछ समय मिलता एकत्रित होकर अपने उक्त ज्ञान एवं स्मृतियों को एक दूसरे को परस्पर सुनते-सुनाते।
अपने इस विकास काल में हिंदी लगभग पूर्णरूप से प्रवासी भारतीयों की संपर्क भाषा का स्थान ले चुकी थी। औपनिवेशिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी भारतीयों को समझने और समझाने के लिए उनकी भाषा सीखनी पडी। यहाँ तक कि बहुत से आदिम निवासी भी कुछ-कुछ हिंदी बोलने और समझने लगे। कालांतर में हिंदुस्तानियों का संपर्क फीजी वासियों और अंग्रेजों से अधिक बढ़ जाने के कारण उनकी भाषाओं के शब्द प्रचुर मात्रा में हिंदी में प्रविष्ट हुए। हिंदी के शब्द समूह में बहुत-से देशज शब्द भी प्रविष्ट हुए। गिरमिट, फुलावा, कंटाप, दरेसी, कम्यर, बेलो जैसे शब्द फीजी में ही पैदा होकर हिंदी में समाहित हो गए।
उत्तर भारतीय हिंदुओं की बड़ी आबादी के अलावा मॉरीशस में मुसलमान भी हैं। इनके पूर्वज भी 19वीं सदी के शुरुआती दिनों में मजदूरी करने मॉरीशस गए थे और मोटे तौर पर ये लोग भी उत्तर भारत के ही हैं। इनके अलावा थोड़े से लोग महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के भी हैं। जिस समय भारतीय मजदूरों का मॉरीशस जाना शुरू हुआ, उस समय मॉरीशस की सुगर इंडस्ट्री खत्म होने के कगार पर थी। गन्ने का उत्पादन कम होता जा रहा है और फैक्टरियां बंद हो रही थीं। भारतीय मजदूरों ने उनमें एक नई जान फूंकी। पहले के समय दुनिया भर में चीनी की मांग बढ़ने से मॉरीशस की अर्थव्यवस्था को खासा मुनाफा हुआ था। पर बाद में एकल फसल पर आधारित उद्योग वाली अर्थव्यवस्था के नाते इसका पतन हुआ और फिर धीरे-धीरे यहां दूसरे उद्योग-धंधों का लगना शुरू हुआ। पर आज भी मॉरीशस की एक्सपोर्ट आमदनी में एक-तिहाई हिस्सा चीनी का है। उद्योगों के अलावा पर्यटन मॉरीशस की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है।
मॉरीशस की आबादी में लगभग 68 फीसदी भारतीय हैं। इनमें से आधे से ज्यादा करीब 52 फीसदी उत्तर भारत के लोग हैं, जिनके पूर्वज भोजपुरी बोलते थे। यह उत्तर भारत के मजदूरों का जीवट था कि वे विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रहे और काम करते रहे, पर यह मॉरीशस की सहिष्णुता भी थी, उसने उन भारतीयों को फलने-फूलने और आगे बढ़ने का मौका दिया। इसकी एक मिसाल शिवसागर रामगुलाम हैं, जो अंग्रेजों की गुलामी से मॉरीशस के मुक्त होने के बाद वहां के पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्हें मॉरीशस में राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल हुआ।
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– pooja pandey (eraofgirl)