Note: कोई भी धर्म या उस धर्म का पवित्र ग्रंथ कभी भी गलत करना या नफरत फैलाना नहीं सिखाता । तो आप लोगो (हिन्दू) से अनुरोध है की नफरत छोड़ कर आइये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्या संदेश देता है ये कुरान-ए-शरीफ ग्रंथ। ऐसे तो समय मिलेगा नही कभी कुरान पढ़ने का,तो कुछ 10-12 मिनटों का समय निकाल कर आइये जानते है कि आखिर है क्या कुरान-ए-शरीफ में । – पूजा पाण्डेय

राष्ट्र की एक छोटी लेखिका होने के नाते मेरा फर्ज बनता है कि उन प्रत्येक सामाजिक मुद्दों पर लिखूं, जो समसामयिक हों, सामाजिक बेहतरीकरण के हिस्सेदार हों और हम सबको एक नई राह दिखलाने में सहायक हों। लिखने से पहले मैंने पवित्र मजहबी पुस्तक कुरान-ए-शरीफ एवं हदीश को तसल्ली से पढ़ी, गहराई से समझने की कोशिश के साथ-साथ एक व्यापक मनन-चिंतन भी किया।
खैर, कुछ तथाकथित सेक्यूलर लोग यह जरूर बोल सकते हैं कि यह अनावश्यक विषय है, मजहबी मामला है, इसमें हिन्दू लेखिका द्वारा लेख लिखा जाना ठीक नहीं है। मुझसे कई लोग अक्सर बोलते भी हैं कि आप एक हिन्दू लेखिका होकर भी मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्म को क्यूं पढ़ती हो? दिक्कत ही क्या है अगर जानकारी ले लेते है । कम से कम हर सवाल का जवाब मिल जाता है । वरना हिन्दू मुश्लिम मुद्दा कभी खत्म नही होगा क्योकि कोई भी एक दूसरे को सुनना नही चाहता । फिर हम सब यही सोचते है कि इनका धर्म ही गलत है जबकि कोई भी धर्म कभी भी गलत सिख नही देता ।

खैर, साहब आपकी सोच आपको मुबारक हो। मैं एक कालजयी लेखिका नहीं बनना चाहती, समाज की विसंगतियों पर में सतत कलम चलाती रहूंगी जिससे कि समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव आ सके। मेरा इससे दूर दूर तक लेना-देना नहीं है कि आप मेरे बारे में क्या सोचते हैं? आप स्वतंत्र हैं, सोचते रहिए साहब। मैं एक स्वतंत्र लेखिका हूं, सतत लिखती रहूंगी। न तो मैंने कभी कलम को नीलाम किया है और न ही आगे करूंगी।
अल्लाह के द्वारा उतारी गई एवं देवदूत जिब्राएल द्वारा हजरत मुहम्मद को पहली बार सुनाई गई पवित्र कुरान मुस्लिम धर्म की नींव है। कुरान में कुल 114 सूरह, 540 रूकू, 14 सज्दा, 6,666 आयतें, 86,423 शब्द, 32,376 अक्षर, 24 नबियों का जिक्र है।
किंवदंतियों की मानें तो आदम को इस्लाम का पहला नबी यानी पैगम्बर माना जाता है। जिस प्रकार हिन्दू धर्म में मनु की संतानों को मनुष्य कहा जाता है, उसी प्रकार इस्लाम में आदम की संतानों को आदमी कहा जाता है और आदम को ही ईसाइयत में एडम कहा जाता है।
विशेष ज्ञातव्य है कि अल्लाह धरती पर किसी को भेजने से पहले ठीक-ठीक नसीहत देकर भेजता है और कहता है कि सीमित समय के लिए धरती पर जा रहे हों, वहां जाकर नेक कर्म ही करना। कुरान में भी कहा गया है कि सकारात्मक कार्य करो, जीवहत्या, पेड़ काटना, किसी को तकलीफ पहुंचाना, व्यर्थ पानी बहाना, अन्य गलत कार्य कुरान के मुताबिक पाप हैं। प्रत्येक आदमी को वापस अल्लाह के पास ही जाना पड़ेगा, कभी न कभी उसके अच्छे-बुरे कार्यों का हिसाब जरूर होगा। अल्लाह के सारे खलीफा या नबियों का एक ही पैगाम रहता है कि खुदा के बताए हुए राह पर कायम रहो, ईमान रखो और अल्लाह पर भरोसा रखो।
जो हजयात्रा करके वापस आते हैं, उन्हें ‘हाजी’ कहा जाता है। मगर हज तभी कुबूल होती है, जब हज करने वाला शख्स जकात और फितरा को जीवन में उतारकर अल्लाह के रसूलों के मुताबिक कार्य करता है। जो कुरान को अच्छी तरह से जानते, समझते और उसकी आयतों को जुबान पर रखते हों, उन्हें ‘हाफिज’ कहा जाता है। रमजान के महीने में मुसलमान अक्सर नमाज अदा करते हैं, रोजा रखते हैं, तकरीर भी करते हैं। कुरानशरीफ को आसानी से समझने और रसूलों से वाकिफ होने के लिए मौलवियों ने अपने-अपने तरीके से हदीश की विवेचना की है।
कुरान अरबी भाषा में लिखी गई है और इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है। विश्व के कई देशों एवं करोड़ों लोगों द्वारा पढ़ी जाने वाली कुरान के मुख्यत: 5 स्तंभ हैं-
- शहादा (साक्षी होना)- गवाही देना। ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह’ मतलब अल्लाह के सिवाय और कोई परमेश्वर नहीं है और मुहम्मद, अल्लाह के रसूल हैं इसलिए प्रत्येक मुसलमान अल्लाह के एकेश्वरवादिता और मुहम्मद के रसूल होने के अपने विश्वास की गवाही देता है।
- सलात (प्रार्थना)- इसे फारसी में नमाज कहते हैं। इस्लाम के अनुसार नमाज अल्लाह के प्रति कृतज्ञता दर्शाती है। मक्का की ओर मुंह करके दिन में 5 वक्त की नमाज हर मुसलमान को अदा करना होता है।
- रोजा (रमजान)- यानी व्रत। इसके अनुसार रमजान के महीने में प्रत्येक मुसलमान को सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्रत रखना अनिवार्य है। भौतिक दुनिया से हटकर ईश्वर को निकटता से अनुभव करना एवं निर्धन, गरीब, भूखों की समस्याओं और परेशानियों का अनुभव करना ही मुख्य उद्देश्य है।
- जकात- यह वार्षिक दान है। इसके अनुसार प्रत्येक मुसलमान अपनी आय का 2.5% निर्धनों में बांटता है, क्योंकि इस्लाम के अनुसार पूंजी वास्तव में अल्लाह की देन है।
5- हज (तीर्थयात्रा)- इस्लामी कैलेंडर के 12वें महीने में मक्का में जाकर की जाने वाली धार्मिक यात्रा है, परंतु हज उसी की कुबूल होती है, जो आर्थिक रूप से सामान्य हो और हज जाने का खर्च खुद उठा सके।
गौरतलब है कि कुरान के प्रत्येक सूरा के शुरुआत में ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्ररहीम’ आता है। इसका मतलब है कि प्रत्येक मुसलमान प्रार्थना (अल्लाह के नाम से शुरू, जो बहुत मेहरबान रहमत वाला) करता है और कहता है कि ‘हे अल्लाह! तू मुझे अपने बताए हुए उसूलों और ईमान पर चला, तू ही सारे जहान का मालिक है, रहमत वाला है, हम तुझी पर न्योछावर हैं, हमको सीधा रास्ता चला परंतु रास्ता तुझे पाने का हो, न कि बहकाने वालों का हो।’
राम, रहीम एवं हनुमान, रहमान के पैगाम में कोई फर्क नहीं है बशर्ते उसकी प्रार्थना और पाने का रास्ता भिन्न-भिन्न है। जिस कुरान के प्रत्येक सूरा में खुदा से रहमत की बात कही गई हो, वह कभी हिंसात्मक हो ही नहीं सकता। प्रत्येक धर्म में कुर्बानी की बात कही गई है, परंतु उसका यह कतई अर्थ नहीं है कि आप जीव-जंतु, पशु-पक्षी की हत्या करें। कुर्बानी का मतलब यह है कि आप अपनी आवश्यकता से अधिक धन-दौलत एवं विद्या गरीबों और जरूरतमंदों के लिए समर्पित यानी कुर्बान करें।
अशफाक उल्ला खां, इलाहाबाद से लियाकत अली, बरेली से खान बहादुर खां, फैजाबाद से मौलवी अहमद उल्ला, फतेहपुर से असीमुल्ला, मौलाना अबुल कलाम, ब्रिगेडियर एम. उस्मान, मेजर अनवर करीम व अन्य ऐसे तमाम क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त थे जिन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठकर भारत मां की आन-बान व शान की रक्षा करने हेतु प्राणों को न्योछावर कर दिया। इस सब महान आत्माओं के लिए धर्म से बढ़कर राष्ट्र था। इन्होंने सही मायने में जीवन को समझा और कुर्बानी दी।
अहिंसा, प्रेम, सद्भाव ही सभी धर्मों का मूल है और सबका मालिक भी एक है। फर्क इतना ही है कि हम उसे अलग-अलग नामों से जानते हैं। आप ही बताइए कि गर दुनिया को चलाने वाला एक है तो उसका पैगाम अलग-अलग कैसे हो सकता है? मानवता ही हम सबका का पहला धर्म है।
अच्छाइयां व बुराइयां प्रत्येक जगह होती हैं, मगर समयोपरांत हम बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों को आत्मसात करते हैं इसलिए आज बाकी धर्मों के साथ-साथ इस्लाम धर्म के अनुयायियों को चाहिए कि वे अपनी मजहबी दुनिया से बाहर निकलकर मानवता एवं संविधान को सर्वोपरि समझें, मजहबी खामियों को दूर करें, सुप्रीम कोर्ट द्वारा तात्कालिक तीन तलाक पर रोक इसी की एक बानगी है और यह फैसला सचमुच काबिले तारीफ भी है।

बेहतर होगा कि इस्लाम धर्म के जानकार और अनुयायी चिंतन करके कौम एवं मानव हित में सकारात्मक बदलाव लाएं, कुरान-ए-शरीफ के बताए हुए सही मार्गों पर चलें। समय के साथ बदलाव अवश्यंभावी है और होना भी चाहिए।
कुरान रमजान में आसमान से उतारी गई कुरान की सुरह अलबकरा की आयत 185 में अल्लाह फरमाते हैं कि रमजान वो महीना है जिसमें आसमान से कुरान को उतारा गया. रमजान के महीने की वो रात कौन सी थी इसे साफ-साफ नहीं बताया गया है. हालांकि, उलेमा इसे लेकर अनुमान लगाते हैं कि रमजान के आखिरी असरा में यानी अंतिम दस दिनों में ताक रातें जैसे 21, 23, 25, 27 में से कोई एक रात है, जिसमें कुरान नाजिल हुई. इसीलिए रमजान को तालीम का महीना माना जाता है.
तराबी नमाज में कुरान रमजान में पढ़ी जाने वाली विशेष नमाज को तराबी नमाज कहा जाता है. इसे रमजान के चांद निकलने से लेकर ईद के चांद निकलते तक रात इशा की नमाज के बाद पढ़ा जाता है. इस नमाज में कुरान सुनाने का आयोजन किया जाता है ताकि लोग खुद कुरान की बातों को सुनकर उसपर अमल करें और अपने जैसे दूसरे इंसानों तक उन बातों को फैलाएं. कुरान में जिंदगी गुजर बसर करने के अल्लाह ने तरीके बताए हैं. इस्लामिक शरियत कुरान और हदीस पर आधारित है. कुरान पर ईमान रखना हर मुसलमान को लिए जरूरी बताया गया है.
कुरान हिदायत का रास्ता दिखाती है. इससे हर मुतक्की लाभ उठा सकता है. मुतक्की वो शख्स है, जो हक को और सच को तलाश करने वाला हो. कुरान पर किसी तरह का कोई मतभेद नहीं है. कुरान में हर समस्या का समाधान बताया गया है, बस उसे समझने की सलाहियत होनी चाहिए. कुरान में हर उस बात का जिक्र किया गया है, जो हमें सही और इंसानियत के रास्ते पर चलना सिखाती है.
कुरान के उतरने का एक मकसद था, उस समय के लोगों में शांति और सौहार्द लाना, कुरान के संदेशों के बाद काफी अनपढ़ लोग सभ्य हो गए थे। कुरान दरअसल जीवन व्यापन करने का तरीका है, सिर्फ एक पुस्तक नहीं है – ऐसा मुस्लिम मानते हैं।
कुरान में जीवन व्यापन, शादी, रिश्तेदारों से व्यवहार, व्यापार, युद्ध, जायदाद का बटवारा आदि सभी के बारे में विश्लेषण है। कुरान एक मार्गदर्शन की पुस्तक है तथा अल्लाह/ईश्वर का अंतिम प्रकाशन है, मुस्लिम इस ग्रंथ को धर्म की सच्चाई का संकेत मानते हैं।
कुरान एक मार्गदर्शन की पुस्तक है तथा अल्लाह/ईश्वर का अंतिम प्रकाशन है, मुस्लिम इस ग्रंथ को धर्म की सच्चाई का संकेत मानते हैं। मुस्लिम इतिहास के मुताबिक मुहम्मद ने मदीना में स्वतंत्र मुस्लिम समुदाय का गठन किया और अपने कई साथियों को कुरान पढ़ने और कानूनों को सीखने का आदेश दिया। इस प्रकार मुस्लिमों का एक समूह साक्षर बना।
कुरान के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पुस्तक जब से अस्तित्व में आई है, से लेकर आज के दिन तक बदली नहीं है, मतलब इसमें किसी के भी द्वारा कोई एक भी बदलाव नहीं किया गया है। यह सबसे शुद्ध रूप में है और ना ही इसकी तुलना मानवीय बोली से की जा सकती है- ऐसा मुस्लिम मानते हैं।
कुरान पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है।
कुरान में 30 पाठ है, 114 अध्याय है (जिन्हें सूरत कहते हैं), हर अध्याय में श्लोक हैं जिन्हें आयत कहते हैं, कुरान में 6666 आयतें हैं, कुछ के अनुसार 6238।
पूरे 22 साल 5 महीने और 14 दिन लगे थे कुरान को पूरी तरह उतरने में।
कुरान पहली बार आखरी पैगंबर मुहम्मद को मक्का की एक हीरा नाम की गुफा में सुनाया गया था।
इस्लाम की मान्यता:-
मुस्लिम मानते हैं कि अल्लाह ने सबसे पहले फरिश्तों को रोशनी से बनाया, जिन्न/शैतान को आग से बनाया और फिर मिट्टी से आदम को बनाया और आदम की पसली से उनकी बीवी हव्वा को बनाया। इतिहासकारों के अनुसार जिन्न आदम से बैर रखता था, क्योंकि अल्लाह ने जिन्न को आदम को सजदा करने (के आगे झुकने) को कहा था,
परंतु शैतान ने यह बात नहीं मानी और यह दलील दी कि मैं पहले बना हूं और आग से बना हूं, जो की मिट्टी से बेहतर है। शैतान ने एक दिन आदम और उनकी बीवी को एक पेड़ का फल खाने पर मजबूर कर दिया, जिसे अल्लाह ने खाने को मना किया था।
इस बात से अल्लाह बहुत नाराज हुए और आदम और उनकी बीवी को जमीन/पृथ्वी पर भेज दिया और उनसे कहा गया कि आप इस पृथ्वी पर एक सीमित समय के लिए है, आपकी संताने होगी और उनकी भी बहुत संतानें, साधनों का उपयोग करने की छूट है आदि; परंतु उस समय सीमा के बाद अल्लाह के पास सभी को वापस लौटना होगा। उस सिमित वक्त में आप सभी कार्य कर सकते हैं
सभी अच्छे और बुरे कार्यों का हिसाब कयामत के दिन होगा जिसे मुस्लिम आखिरत कहते हैं (अंतिम दिन कहते हैं)। इन सब के उपरांत अल्लाह ने मनुष्य को ठीक रूप से जीवन गुजारने के लिए आदेशों को पहुंचाने का प्रबंध किया जो कि कुरान में लिखे गए आदेश है अथवा पृथ्वी पर अपने दूत/ पैगंबर/संदेशवाहक भेजें जो मनुष्यों को ईश्वर का संदेश दें।
कहा जाता है कि अब तक कुल संख्या में 1,84,000 दूत भेजे जा चुके हैं और अंतिम मुहम्मद थे, यह भी कहा गया है कि कुरान के बाद अब और कोई ईश्वरीय किताब नहीं आएगी।
इस्लाम एवं कुरान के आदेश
कुरान में दी गई कुछ महत्वपूर्ण सिख जो हमें ज़रूर जनना और जीवन में उतारना चाहिए –
अपने आसपास सभी के साथ मुहब्बत/प्रेम से रहे।
मां बाप का सम्मान करें, अगर उनके द्वारा तकलीफ पहुंचती है तो उफ्फ तक ना करें, उसका बदला या इनाम आपको दुनिया में और मृत्यु के बाद, दोनों में मिलेगा।
ध्यान रखें कि आपका पड़ोसी भूखा ना सोए, वरना मुस्लिम होने के तौर पर यह आपकी हार होगी।
किसी बेकसूर का कत्ल ना करें।
बिना वजह पानी ना बहाए।
जो भी आपको इस पृथ्वी पर इस जीवन में दिया गया है, उस पर ईश्वर का धन्यवाद कहें, कमियां ना निकाले। जितना ज्यादा धन्यवाद कहेंगे, उतना अधिक अल्लाह/ईश्वर कृपा करेंगे और कमी निकालने पर छीन लेंगे।
औरत पर्दे में रहे, अपने शरीर को ढककर रखें, खास तौर पर सिर का ढ़कना जरूरी है, चेहरे को ढ़कना जरूरी नहीं है।
मर्द के लिए यह पर्दा है कि वह जब भी किसी महिला के पास हो तो अपनी नजर नीची करके रखें।
मां बाप को प्रेम की दृष्टि से देखना भी एक पुण्य का काम है।
हमारे कंधों पर फरिश्ते बैठे रहते हैं, जो कि अच्छे काम/नेकी को 10 गुना करके लिखते हैं तथा ईश्वर तक पहुंचाते हैं और 4 गलतियों को एक गलती करके लिखते हैं।
साफ सफाई को इस्लाम धर्म में आधा ईमान/भरोसा/विश्वास कहा जाता है तथा मुस्लिम को अपने शरीर की साफ सफाई पर खास ध्यान देना चाहिए।
अगर आपको कोई तंग करता है, तो आप उसका उतना ही बराबर बदला उससे ले सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं पर अगर आप सब्र करेंगे तो अल्लाह/ईश्वर बेहतर फैसला देगा – ऐसा माना जाता है।
Thanks for reading.
Pooja Pandey .