प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) का इतिहास:-


प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना स्वयं प्रकृति। यह चिकित्सा विज्ञान आज की सभी चिकित्सा प्राणालियों से पुराना है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि यह दूसरी चिकित्सा पद्धतियों कि जननी है। इसका वर्णन पौराणिक ग्रन्थों एवं वेदों में मिलता है, अर्थात वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में भी यह पद्धति प्रचलित थी।

आधुनिक युग में डॉ॰ ईसाक जेनिग्स (Dr. Isaac Jennings) ने अमेरिका में 1830 के दशक में दवा को ‘पूर्ण भ्रम’ (gross delusion) कहा था । चिकित्सा सम्बन्धी उनके पूर्व प्रयोगों से उन्हें विश्वास हो गया था कि केवल प्रकृति ही अपनी खराब हुई ‘मशीनरी‘ को ठीक कर सकती है। जोहन बेस्पले ने भी ठण्डे पानी के स्नान एवं पानी पीने की विधियों से उपचार देना प्रारम्भ किया था।

महाबग्ग नामक बोध ग्रन्थ में वर्णन आता है कि एक दिन भगवान बुद्ध के एक शिष्य को सांप ने काट लिया तो उस समय विष के नाश के लिए भगवान बुद्ध ने चिकनी मिट्टी, गोबर, मूत्र आदि को प्रयोग करवाया था और दूसरे भिक्षु के बीमार पड़ने पर भाप स्नान व उष्ण गर्म व ठण्डे जल के स्नान द्वारा निरोग किये जाने का वर्णन 2500 वर्ष पुरानी उपरोक्त घटना से सिद्ध होता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के साथ-2 योग एवं आसानों का प्रयोग शारीरिक एवं आध्यात्मिक सुधारों के लिये 5000 हजारों वर्षों से प्रचलन में आया है। पतंजलि का योगसूत्र इसका एक प्रामाणिक ग्रन्थ है इसका प्रचलन केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी है।

प्राकृतिक चिकित्सा का विकास (अपने पुराने इतिहास के साथ) प्रायः लुप्त जैसा हो गया था। आधुनिक चिकित्सा प्राणालियों के आगमन के फलस्वरूप इस प्रणाली को भूलना स्वाभाविक भी था। इस प्राकृतिक चिकित्सा को दोबारा प्रतिष्ठित करने की मांग उठाने वाले मुख्य चिकित्सकों में बड़े नाम पाश्चातय देशों के एलोपैथिक चिकित्सकों का है। ये वो प्रभावशाली व्यक्ति थे जो औषधि विज्ञान का प्रयोग करते-2 थक चुके थे और स्वयं रोगी होने के बाद निरोग होने में असहाय होते जा रहे थे। उन्होने स्वयं पर प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग करते हुए स्वयं को स्वस्थ किया और अपने शेष जीवन में इसी चिकित्सा पद्धति द्वारा अनेकों असाध्य रोगियों को उपचार करते हुए इस चिकित्सा पद्धति को दुबारा स्थापित करने की शुरूआत की। इन्होने जीवन यापन तथा रोग उपचार को अधिक तर्कसंगत विधियों द्वारा किये जाने का शुभारम्भ किया।

प्राकृतिक चिकित्सा संसार मे प्रचलित सभी चिकित्सा प्रणाली से पुरानी है। प्राचीन ग्रंथों मे जल चिकित्सा व उपवास चिकित्सा का उल्लेख मिलता है। पुराण काल मे (उपवास) को लोग अचूक चिकित्सा माना करते थे।

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का जन्म हुआ। तथा इसकी उपयोगिता की महत्ता भी भारत में अति प्राचीन समय से चली आ रही है। जिन-2 स्वास्थ्य सम्बन्धी प्राकृतिक क्रियाओं का हम प्रयोग कर रहे हैं वे सभी उपचार की पद्धतियां पूर्वावस्था में प्राचीन भारत में विद्यमान थी। भारत में ही रोग निवारण के लिए इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया वरन् अन्य कई देशों में भी इस पद्धति का प्रयोग आज किया जा रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की ही देन है परन्तु कुछ कारणों तथा अन्य विकासों के प्रभावानुसार यह पद्धति भारत में लुप्त हो गई। इसके बाद इसके पुनः निर्माण का श्रेय विदेशों (पाश्चात्य देशों) को ही है।

18वीं शताब्दी के मध्य से कुछ लोगों के प्रयास के फलस्वरूप प्राकृतिक चिकित्सा का प्रारम्भ तथा विकास फिर शुरू होने लगा तथा हम इस चिकित्सा को पुनः जानने लगे। इस पद्धति के पुनरूथान में जिन महान और प्रभावशाली व्यक्तियों का योगदान है वह पहले से ही रोगों को ही उपचार के लिए औषधियों का प्रयोग करते थे परन्तु औषधियों के प्रयोग के बाद भी रोगों पर सफलता न पा सकने तथा उसके प्रतिकूल प्रभावों को जानने के बाद और स्वयं पर भी औषधि चिकित्सा की प्रणाली के कटुफल चखने के बाद प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ग्रहण कर स्वस्थ जीवन जीने लगे। इन्होंने इस पद्धति के चमत्कारों से प्रभावित होने के कारण इस पद्धति के प्रचार-प्रसार और विकास में लग कर प्राकृतिक चिकित्सा को नया जन्म दिया।

जेम्स क्यूरी और सर जॉन फ्लायर :_
डॉ॰ फ्लायर (Sir John Floyer) इंग्लैड के लिचफील्ड नगर के निवासी थे। लिचफील्ड के एक सोते के पानी में कुछ किसानों को नहाकर स्वास्थ्य लाभ करते देख उन्हे जल के स्वास्थ्यवर्द्धक प्रभाव के सम्बन्ध में अधिकाधिक जांच पड़ताल करने की प्रबल इच्छा हुई। इसके कारण उनका रूझान इस पद्धति की ओर हुआ।

डॉ॰ जेम्स क्यूरी (James Currie) लिवरपुल के रहने वाले थे सन् 1717 ई. को लगभग इन्होने एक जल चिकित्सा सम्बन्धित पुस्तक लिखकर उसका प्रकाश कराया।

लुई कूने
डॉ॰ लूई कूने (Louis Kuhne) एक प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में जाने जाते है। इनका जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को विषेशकर जल चिकित्सा को उन्नति के शिखर तक पहुंचाने के लिए जीवन का अधिकांश समय दिया। इसके साथ ही उन्होने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें “The new science of Healing” तथा “The science of facial Expression” लिखी

इन्होने रोग के कारण और उपचार पर जोर देते हुए चिकित्सा प्रारम्भ की और अन्ततः लिपजिंग (Leipzig) नगर में अपना एक चिकित्सालय भी स्थापित किया। जल चिकित्सा में प्रयोग होने वाले उपकरणों की डिजाइनिंग करके हिप बाथ आदि की शुरूआत में महत्वपूर्ण योगदान दिया जो आज भी प्राकृतिक चिकित्सा में उनके नाम से प्रसिद्ध है (जैसे मेहन स्नान को लूई कूने नाम से ही जाना जाता है।) उन्होने विजातीय द्रव्य के पनपते की और उसके विभिन्न स्थानों पर जमा होने पर विस्तृत रूपरेखा तैयार की।

आपका जन्म एक जुलाहे परिवार में हुआ था। लेकिन इन्हे कई दर्दनाक परिस्थितियों का सामना करना पडा। माता-पिता के आकास्मक निधन व अपने शरीर के असाध्य फोडों के कारण औषधिविज्ञान के चिकित्सकों के द्वारा हतोत्साहित होना पडा। इसी कारण उन्हे अपने लिए किसी सुदृढ चिकित्सा प्रणाली की आवश्यकता हुई और प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ले स्वास्थ्य को प्राप्त करने में सफल भी हो गए।

विन्सेंज प्रिस्निज
विन्सेंज प्रिस्निज (Vincenz Priessnitz) जन्म सन् 1799 में आस्ट्रेलिया में हुआ। इनको जल चिकित्सा का जनक कहा जाता है। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा में आने से पूर्व एक घायल देखा जो बार-2 अपने उस घाव को लेकर पानी के तलाब में लेटता था। ऐसा कुछ दिनों करने पर उसका घाव पूरी तरह ठीक हो गया था, इसे देखकर उन्होने कई प्रयोग करे परन्तु इन प्रयोगों के करने के कारण उनको न्यायालय में भी उपस्थित होना पड़ा परन्तु अन्ततः न्यायालय द्वारा इस पद्धति को हितकारी मानते हुए न्यायालय द्वारा उनके हित में ही फैसला सुनाया गया। इसके पश्चात उन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का खुलकर उपचार अपने घर पर ही देना शुरू किया। प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में उनका विरोध होने पर भी बिना डरे उन्होने अपने पूरे विश्वास और लगन से इसके अनेकों चमत्कार किए तथा पूरी दुनिया द्वारा भी माने गए।

डॉ॰ इसाक जेनिंग
औषधि विज्ञान के डॉक्टर के रूप में पहुचाने जाने वाले डॉ॰ जेनिंग (Dr. Isaac Jenning) अमेरिका में 1788 में पैदा हुए और उन्होने प्रकृति एवं सफाई को अधिक महत्व देते हुए एक बुखार के रोगी को उपवास, विश्राम और अत्यधिक पानी के सेवन के साथ शान्त वातावरण में रहने की सलाह दी इस प्रकार वह अन्य दुसरे रोगों में एक टाइफाइड के रोगी को जिस पर दवाओं का कोई असर नहीं हो रहा था का प्राकृतिक उपचार किया। जिससे रोगी की स्थिति में सुधार होने लगा। सन् 1822 में उन्होने पूरी तरह से दवाओं का प्रयोग बन्द कर दिया और प्राकृतिक चिकित्सा करने लगे। इसका प्रयोग करने से रोगियों की मृत्युदर में गिरावट आने पर चमत्कारी प्रभाव सामने आने लगे। तथा स्वस्थ होने में भी परिणाम शीघ्र प्राप्त होने लगे। इससे उन्होने निष्कर्ष निकाला की रोग बाहरी वातावरण की नहीं वरन जीवनी शक्ति के ह्रास की देन है। उनकी उपचार पद्धति को आर्थोपैथी के नाम से जाना जाता है। इन्होने तीन किताबें लिखी “The medicial reform”, “Philosophy of human life” तथा “The tree of human life as human degeneracy” हैं।

बेनिडिकट लुस्ट
बेनिडिकट लुस्ट (Benedict Lus), फादर नीप के प्रिय शिष्यों में से एक थे। इनका जन्म 3 फरवरी 1872 ई. को हुआ था। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का प्रचार प्रसार अमेरिका में जाकर किया। अमेरिका में ही इन्होने नीप-वाटर क्योर नामक एक मासिक पत्र निकाला तथा बाद में एक पत्र नेचर्स-पाथ भी स्थापित किया इनके द्वारा न्यूयार्क में एक स्कूल तथा कालेज की स्थापना की। जो अब सुप्रसिद्ध यंग बार्न्स अस्पताल में परिणत हो गया है। यही नहीं इसके अतिरिक्त भी इन्होने कई अन्य अस्पतालों स्कूलों तथा संस्थाओं की भी स्थापना की। इनका देहान्त 1950 ई. अपने द्वारा स्थापित अस्पताल में ही हुआ।

जे. एच. टिल्डेन
जेम्स हेनरी टिल्डेन (John Henry Tilden) जन्म अमेरिका में हुआ। इन्होने उपचार में कारणों को दूर करने पर जोर दिया जिनके द्वारा रोग उत्पन्न होते है। तथा रोगी को प्राकृतिक जीवन जीने की शिक्षा पर भी इन्होने बल दिया इन्होने प्रसिद्ध पुस्तक “Impaired health” भी लिखी।

हेनरिच लेमैन
हेनरिच लेमैन (Johann Heinrich Lahmann) जर्मनी में रहने वाले तथा एलोपैथी को मानने वाले थे। परन्तु बाद में इन्होने ड्रेसडेन में एक स्वास्थ्य-गृह भी बनाया जिसके द्वारा इन्होने मानव स्वास्थ के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता पर अनुसंधान किए तथा यह सिद्ध किया कि स्वस्थ रहने के लिए आहार ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बरनर मैकफेडन
बरनर मैकफेडन (Bernarr Macfadden) बहुत ही प्रसिद्ध चिकित्सक थे। इन्होने पूरा जीवन प्राकृतिक जीवन व व्यायाम पद्धतियों का अनुभव कर उसे प्रयोग करके रोगों को दूर करने पर जोर दिया। व्यायाम पद्धतियों का स्वयं अनुभव करके “फादर ऑफ फिजिकल कलचर” की उपाधि को प्राप्त किया। इन्होने “Book of health”, “Fasting for health” तथा “Macfaddens eneyolopedia for physical culture” आदि दर्जनो पुस्तकों भी लिखी। उपवास पर इन्होने अपनी पकड़ बनाई तथा उपचार में इसका प्रयोग किया।

सर विलियम अर्बुथनाट लेन
सर विलियम अर्बुथनाट लेन (Sir William Arbuthnot Lane) एक एलोपैथी के चिकित्स थे फिर भी इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के प्रभावों से खूब प्रभावित हुए तथा इस पर विश्वास करके इन्होने इसका खूब प्रचार प्रसार किया। इन्होने एक सुप्रसिद्ध पुस्तक “Good Health” भी लिखी।

जे. एच. केलाग
जॉन हार्वे केलॉग (John Harvey Kellogg) को पूरा संसार प्राकृतिक चिकित्सक के नाम से जानता है। इनका जन्म 2 6 फ़रवरी सन् 1852 ई. को अमेरिका में हुआ। इन्होने एक विशेष प्रकार का बैटिल क्रीक सेनीटोरियम बनाया जिसमें सभी चिकित्सा प्रणालियों जैसे जल चिकित्सा, आहार चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, स्वीडिश मूवमेन्ट तथा विद्युत-चिकित्सा आदि द्वारा उपचार होता है। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में कई प्रकार के आविष्कार भी किए जिनमें विद्युत ज्योतिस्नान (Electric lights bath) महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इन्होने “दि न्यु डायटेरिक्स”, “रैशनल हाइड्रोथिरैपी” तथा “होम हैंड बुक ऑफ हाइजीन एण्ड मेडिसिन” आदि पुस्तकें भी लिखी।

सर विलियम
यह भी हेनरिच लेमैन तथा सर विलियम की तरह ही एक प्रसिद्ध ऐलोपैथी के चिकित्सक होते हुए भी प्राकृतिक चिकित्सा में अगाध विश्वास रखते थे। इन्होने “The principles practice of medicine” नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।

ब्ले सेलमन एम. डी., विन्टर निट्रल, आटो कार्क, एडगर, जे. सैकसन शेल्टन, इलियर, पंज, ओसवाल्ड, हरबर्ट स्पेन्सर, टर्न वेटर जान, बोन पीजली, हैन्स माल्टेन, एडविन बैबिट एन. डी., मिल्टन पावल आदि अनेकों ही और भी चिकित्सक हैं जिन्होने अपना जीवन प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किया तथा इसके द्वारा रोगों का उपचार करके अनेकों रोगों पर विजय प्राप्त की।

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी महान प्राकृतिक चिकित्सक थे। इन्होने भारत में प्राकृतिक चिकित्सा के अतिरिक्त उपवास और सत्याग्रह के नियमों का भी अनुपालन किया। इन्होने सर्वप्रथम भारत में प्राकृतिक आश्रम का निर्माण किया। इन्होने ‘आरोग्य की कुंजी’ का सम्पादन किया जिसका प्रचार-प्रसार देश और विदेश में हुआ तथा लाखों लोगों ने इससे लाभ उठाया।

गांधी जी ने एडोल्फ जुस्ट द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिटन टू नेचर‘ का अध्ययन करके प्राकृतिक चिकित्सा की प्रेरणा प्राप्त की और इस क्षेत्र में बहुत सफलता प्राप्त की। इन्होने भारत के साथ-2 विदेशों में भी इस पद्धति का प्रचार किया। इनकी लिखी पुस्तकों में “Diet & Diet reform” अपने समय की आहारशास्त्र की लाभकारी और उपयोगी पुस्तक है।

सन्त विनोबा भावे
विनोबा भावे महात्मा गांधी जी के आध्यात्मिक आचार्य थे तथा इन्होने भी राम नाम तत्व की प्राकृतिक चिकित्सा से महत्वपूर्ण बताते हुए ‘राम नाम एक चिन्तन’ पुस्तक में प्राकृतिक जीवन के मूलभूत आदर्शों का बड़े सुन्दर विवेचन किया। इन्होने कई सम्मेलनों में प्राकृतिक चिकित्सकों का विषेष मार्गदर्शन किया।

मोरार जी देसाई
अंग्रेजी शासन के समय एक उच्च पद पर कार्यरत होते हुए भी इन्होने इसका त्याग कर स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया और भारत के प्रधानमंत्री का पद भार को सम्हालते हुए प्राकृतिक चिकित्सा को नया मोड दिया। इन्होने कई पुस्तकों के द्वारा अपने अनुभवों को जन-2 तक पहुचाया।

प्राकृतिक चिकित्सा की जड़ें 19 वीं शताब्दी में यूरोप में चले ‘प्राकृतिक चिकित्सा आन्दोलनों‘ में निहित हैं।स्कॉटलैण्ड के थॉमस एलिन्सन 1880 के दशक में ‘हाइजेनिक मेडिसिन’ का प्रचार कर रहे थे। वे प्राकृतिक आहार, व्यायाम पर जोर देते थे तथा तम्बाकू का सेवन न करने एव्वं अतिकार्य से बचने की सलाह देते थे। [4]

नेचुरोपैथीशब्द का पहला प्रयोग १८९५ में जॉन स्कील ने किया था। उसी शब्द को बेनेडिक्ट लस्ट ने आगे बढ़ा दिया था जिस कारण अमेरिका के प्राकृतिक चिकित्सक बेनेडिक्ट को यूएस में नेचुरोपैथी का जनक मानते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त

  1. सभी रोग, उनके कारण एवं उनकी चिकित्सा एक है। चोट-चपेट और वातावरणजन्य परिस्थितियों को छोड़कर सभी रोगों का मूलकारण एक ही है और इनका इलाज भी एक है। शरीर में विजातीय पदार्थो के संग्रह से रोग उत्पन्न होते है और शरीर से उनका निष्कासन ही चिकित्सा है।
  2. रोग का मुख्य कारण जीवाणु नही है। जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के ह्रास आदि के कारण विजातीय पदार्थो के जमाव के पशचात् तब आक्रमण कर पाते है जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है। अतः मूल कारण विजातीय पदार्थ है, जीवाणु नहीं। जीवाणु द्वितीय कारण है।
  3. तीव्र रोग चूंकि शरीर के स्व-उपचारात्मक प्रयास है अतः ये हमारे शत्रु नही मित्र है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों के गलत उपचार और दमन कें फलस्वरूप पैदा होते है।
  4. प्रकृति स्वयं सबसे बडी चिकित्सक है। शरीर में स्वयं को रोगों से बचाने व अस्वस्थ हो जाने पर पुनः स्वास्थ्य प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है।
  5. प्राकृतिक चिकित्सा में चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है।
  6. प्राकृतिक चिकित्सा में रोग निदान सरलता से संभव है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपचार से पूर्व रोगों के निदान के लिए लम्बा इन्तजार भी नहीं करना पड़ता।
  7. जीर्ण रोग से ग्रस्त रोगियों का भी प्राकृतिक चिकित्सा में सफलतापूर्वक तथा अपेक्षाकृत कम अवधि में इलाज होता है।
  8. प्राकृतिक चिकित्सा से दबे रोग भी उभर कर ठीक हो जाते है।
  9. प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शारिरिक, मानसिक, सामाजिक (नैतिक) एवं आध्यात्मिक चारों पक्षों की चिकित्सा एक साथ की जाती है।
  10. विशिष्ट अवस्थाओं का इलाज करने के स्थान पर प्राकृतिक चिकित्सा पूरे शरीर की चिकित्सा एक साथ करती है।
  11. प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग नहीं होता। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार ‘आहार ही औषधि’ है।
  12. गांधी जी के अनुसार ‘राम नाम’ सबसे बडी प्राकृतिक चिकित्सा है अर्थात् अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना करना चिकित्सा का एक आवश्यक अंग है।

व्यवहार में प्राकृतिक चिकित्सा
प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है, अपितु यह एक जीवन पद्धति है। इसे बहुधा ‘औषधिविहीन उपचार पद्धति’ कहा जाता है। यह मुख्य रूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है। जहाँ तक मौलिक सिद्धांतो का प्रश्‍न है, इस पद्धति का आयुर्वेद से निकटतम सम्बन्ध है।

प्राकृतिक चिकित्सा के समर्थक खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों, शुद्धि कर्म, जल चिकित्सा, ठण्डी पट्टी, मिटटी की पट्टी, विविध प्रकार के स्नान, मालिश्‍ा तथा अनेक नई प्रकार की चिकित्सा विधाओं पर विशेष बल देते है। प्राकृतिक चिकित्सक पोषण चिकित्सा, भौतिक चिकित्सा, वानस्पतिक चिकित्सा, आयुर्वेद आदि पौर्वात्य चिकित्सा, होमियोपैथी, छोटी-मोटी शल्यक्रिया, मनोचिकित्सा आदि को प्राथमिकता देते हैं।

मानव शरीर खुद रोगों से लडऩे में सक्षम होता है, बस विधि का ज्ञान होना चाहिए। संसाधनों से समृद्ध प्रकृति से निकटता के जरिए आप सेहतमंद बने रह सकते हैं। तनाव होने पर डॉक्टर भी प्राकृतिक स्थल पर घूमने या बागवानी की सलाह देते हैं। नेचुरोपैथी में बिना दवा के विभिन्न बीमारियों का इलाज किया जाता है। पेट की बीमारियों के लिए तो यह
थेरेपी रामबाण है
नेचुरोपैथी यानी प्राकृतिक उपचार। इसमें पंच तत्वों आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी को आधार मानकर चिकित्सा की जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति पंच महाभूतत्वों (मिट्टी, पानी, धूप, हवा व आकाश) पर आधारित है। डॉक्टर से सलाह लेकर घर पर ही इलाज संभव है। इसके अंतर्गत जोड़ों का दर्द, ऑर्थराइटिस, स्पॉन्डलाइटिस, सियाटिका, पाइल्स, कब्ज, गैस, एसिडिटी, पेप्टिक अल्सर, फैटी लीवर, कोलाइटिस, माइग्रेन, मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, दमा, ब्रॉनकाइटिस, सीओपीडी (क्रॉनिक, ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) व त्वचा संबंधी रोगों का उपचार होता है। नेचुरोपैथी में रोग को ठीक करने के साथ ही उसे शरीर से खत्म करने पर ध्यान दिया जाता है। इस चिकित्सा पद्धति में पूरी तरह से प्रकृति में मिलने वाली चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे ही एक उपचार का तरीका है मड थेरेपी, जो कई रोगों के लिए रामबाण है। मिट्टी शरीर के टॉक्सिक को एब्जॉर्ब करती है। इससे त्वचा से संबंधित रोग दूर हो जाते हैं। लंबे समय से चली आ रही स्किन ऐलर्जी की समस्या भी मड थेरपी के जरिए दूर की जा सकती है। मड थेरपी के लिए जमीन में 3 से 4 फीट गहराई में मिलने वाली मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। उपयोग से पहले इसे अच्छे से साफ किया जाता है, ताकि इसमें पत्थर या किसी अन्य प्रकार की अशुद्धि न रह जाए।

ऐसे होता है उपचार:-

मड बाथ, मिट्टी की पट्टी, वेट शीट पैक (गीली चादर लपेट), हॉट आर्म एंड फुट बाथ (गर्म पाद स्नान), सन बाथ (सूर्य स्नान), कटि स्नान, स्टीम बाथ, एनीमा, स्पाइन स्प्रे बाथ, मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग के अलावा उपवास, दूध कल्प, फलाहार, रसाहार, जलाहार के जरिए भी इलाज किया जाता है।

मड थेरेपी के फायदे और इस्तेमाल

मिट्टी से की जाने वाली थेरपी के कई फायदे हैं। इसकी मदद से बॉडी हीट, सिरदर्द, अपच, हाई बीपी जैसी कई बीमारियों को ठीक करने में मदद मिलती है। यदि आपको सिरदर्द हो रहा है तो पानी के साथ मिट्टी को मिलाकर माथे पर लगाएं। इसे करीब आधे घंटा तक लगा रहने दें, आपको सिरदर्द में तुरंत राहत मिलेगी। अपच या कब्ज की परेशानी है तो मिट्टी के पैक को पेट पर लगाएं। इसे 20 से 30 मिनट तक लगा रहने दें। लगातार इस्तेमाल से आपकी पेट से संबंधित समस्या दूर हो जाएगी। कई लोगों को बॉडी हीट की समस्या होती है। इस स्थिति में उन्हें हाथों में या शरीर में जलन का अनुभव होता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए बेस्ट तरीका मड थेरपी है। मिट्टी बॉडी हीट को एब्जॉर्ब करती है, इससे व्यक्ति को तुरंत राहत का अनुभव होता है।

टॉक्सिन को निकालता है शरीर के बाहर

अपचा भोजन और विषैले पदार्थ (टॉक्सिन) शरीर में जमा हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह खून में पहुंचते हैं। इसका असर शरीर के विभिन्न हिस्सों पर पड़ता है। नेचुरोपैथी द्वारा टॉक्सिन को शरीर के बाहर निकाला जाता है। टॉक्सिन बाहर निकलने के साथ शरीर खुद ठीक होना शुरू हो जाता है। राजकुमार शर्मा ने कहा कि नेचुरोपैथी में इलाज थोड़ा धीमे होता है, लेकिन बीमारी पूरी तरह खत्म हो जाती है।

पेट से होती हैं 90 फीसद बीमारी~~~~

जो भी हम खाते हैं उसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। 90 फीसद बीमारियां पेट से जुड़ी होती हैं। इसलिए हम जो भी खाएं उसे सही समय और सही पोषक तत्वों के साथ लें। खाने में प्रोटीन, विटामिन और खनिज की मात्रा बढ़ाएं। कार्बोहाइड्रेट और वसा का सेवन कम करें। सुबह उठकर तीन से चार गिलास गुनगुना पानी पीएं। चीनी, मैदा और सफेद नमन का कम प्रयोग करें। चीनी की जगह ब्राउन शुगर या मिश्री और सफेद नमक की जगह सेंधा नमक का प्रयोग करें!

Naturopathy का उपचार व स्वास्थ्य-लाभ का आधार है – ‘रोगाणुओं से लड़ने की शरीर की स्वाभाविक शक्ति’। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत अनेक पद्धतियां हैं जैसे – जल चिकित्सा, होमियोपैथी, सूर्य चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, मृदा चिकित्सा आदि। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचलन में विश्व की कई चिकित्सा पद्धतियों का योगदान है;

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली चिकित्सा की एक रचनात्मक विधि है, जिसका लक्ष्य प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्त्वों के उचित इस्तेमाल द्वारा रोग का मूल कारण समाप्त करना है। यह न केवल एक चिकित्सा पद्धति है बल्कि मानव शरीर में उपस्थित आंतरिक महत्त्वपूर्ण शक्तियों या प्राकृतिक तत्त्वों के अनुरूप एक जीवन-शैली है। यह जीवन कला तथा विज्ञान में एक संपूर्ण क्रांति है।

इस प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल तथा कच्ची व हलकी पकी सब्जियाँ विभिन्न बीमारियों के इलाज में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा निर्धन व्यक्तियों एवं गरीब देशों के लिये विशेष रूप से वरदान है।

नेचुरोपैथी में कॅरियर बनाकर लोगों का कर सकते हैं प्राकृतिक रूप से इलाज!

आज के समय में लोगों का लाइफस्टाइल जिस तरह का है, उसके कारण हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से ग्रस्त रहता ही है। लेकिन हर समस्या के लिए दवाइयों का इस्तेमाल करना उचित नहीं माना जाता। अगर आप भी लोगों का इलाज प्राकृतिक तरीके से करने में विश्वास रखते हैं तो नेचुरोपैथी में अपना भविष्य बना सकते हैं। यह एक ऐसी वैकल्पिक चिकित्सा है, जिसमें प्रकृति के पांच तत्वों की सहायता से व्यक्ति का इलाज किया जाता है। यह इलाज की एक बेहद पुरानी पद्धति है।

इस क्षेत्र में कॅरियर देख रहे व्यक्ति को सामान्य चिकित्सा व मानव शरीर रचना विज्ञान के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त एक सफल नेचुरोपैथ बनने के लिए आपके भीतर धैर्य, कम्युनिकेशन और लिसनिंग स्किल्स, आत्मविश्वास, मरीज की जरूरतों को समझना, मोटिवेशनल्स स्किल्स व रोगियों के भीतर विश्वास पैदा करने का भी कौशल होना चाहिए।

क्या होता है काम

एक नेचुरोपैथ का मुख्य काम सिर्फ रोगी का इलाज करना ही नहीं होता, बल्कि वह अपने पेशेंट के खानपान और उसके लाइफस्टाइल में भी बदलाव करता है, ताकि व्यक्ति जल्द से जल्द ठीक हो सके। इतना ही नहीं, एक नेचुरोपैथ को मनोविज्ञान का भी ज्ञान होना चाहिए ताकि वह रोगी की स्थित किो समझकर उसे बेहतर उपचार दे सके।

योग्यता

इस क्षेत्र में कॅरियर देख रहे छात्रों का भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीवविज्ञान में कम से कम 45 प्रतिशत अंक होने चाहिए। इसके बाद आप बैचलर ऑफ नेचुरोपैथी और यौगिक साइंस कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें डिप्लोमा कोर्स भी अवेलेबल हैं।

संभावनाएं

एक नेचुरोपैथ वेलनेस सेंटर्स, न्यूटिशन सेंटर, हॉस्पिटल, हेल्थ केयर सेंटर आदि में जॉब तलाश सकते हैं। इसके अतिरिक्त आप एकेडमिक्स, कम्युनिटी हेल्थ सर्विस केयर, सोशल वेलफेयर, मैन्युफैक्चरिंग और नेचुरल प्रॉडक्ट्स कंपनी आदि में भी काम कर सकते हैं। भारत में प्राकृतिक चिकित्सक सरकारी और निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में नियुक्त किए जाते हैं। वैसे लग्जरी होटल व हेल्थ रिसॉर्ट में भी नेचुरोपैथ सर्विसेज दी जाती हैं, वहां पर भी जॉब की जा सकती है। इसके अतिरिक्त आप विभिन्न अखबार, मैगजीन में लिख सकते हैं या फिर खुद का यूट्यूब चैनल चलाकर भी अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। एक अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सक खुद का सेंटर भी खोल सकता है।

आमदनी

एक नेचुरोपैथ यानी प्राकृतिक चिकित्सक का वेतन काफी हद तक उसकी लोकेशन, विशेषज्ञता, योग्यता और अनुभव पर निर्भर करता है। वैसे शुरूआती तौर पर एक नेचुरोपैथ 25 हजार से 50 हजार रूपए आसानी से कमा सकता है। एक बार अनुभव प्राप्त करने के बाद आपको आकर्षक वेतन मिल सकता है!

डॉ पूजा पांडेय ( प्राकृतिक चिकित्सक )

Published by Eraofgirl

I am a Certified Naturopath & Panchkarma Doctor and Consultant. Consultation is free!

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